अब जलेगा क्या ?

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई  २२, २०१६           अपराह्न १ .१५

 

…………………………… अब जलेगा क्या ? …………………………..

जला सब तेल दीया बुझ गया है अब जलेगा क्या।
बना जब पेड़ उकठा काठ तब फूले फलेगा क्या।1।

रहा जिसमें न दम जिसके लहू पर पड़ गया पाला।
उसे पिटना पछड़ना ठोकरें खाना खलेगा क्या।2।

भले ही बेटियाँ बहनें लुटें बरबाद हों बिगड़ें।
कलेजा जब कि पत्थर बन गया है तब गलेगा क्या।3।

चलेंगे चाल मनमानी बनी बातें बिगाड़ेंगे।
जो हैं चिकने घड़े उन पर किसी का बस चलेगा क्या।4।

जिसे कहते नहीं अच्छा उसी पर हैं गिरे पड़ते।
भला कोई कहीं इस भाँत अपने को छलेगा क्या।5।

न जिसने घर सँभाला देश को क्या वह सँभालेगा।
न जो मक्खी उड़ा पाता है वह पंखा झलेगा क्या।6।

मरेंगे या करेंगे काम यह जी में ठना जिसके।
गिरे सर पर न बिजली क्यों जगह से वह टलेगा क्या।7।

नहीं कठिनाइयों में बीर लौं कायर ठहर पाते।
सुहागा आँच खाकर काँच के ऐसा ढलेगा क्या।8।

रहेगा रस नहीं खो गाँठ का पूरी हँसी होगी।
भला कोई पयालों को कतर घी में तलेगा क्या।9।

गया सौ सौ तरह से जो कसा कसना उसे कैसा।
दली बीनी बनाई दाल को कोई दलेगा क्या।10।

भला क्यों छोड़ देगा मिल सकेगा जो वही लेगा।
जिसे बस एक लेने की पड़ी है वह न लेगा क्या।11।

सगों के जो न काम आया करेगा जाति-हित वह क्या।
न जिससे पल सका कुनबा नगर उससे पलेगा क्या।12।

रँगा जो रंग में उसके बना जो धूल पाँवों की।
रँगेगा वह बसन क्यों राख तन पर वह मलेगा क्या।13।

करेगा काम धीरा कर सकेगा कुछ न बातूनी।
पलों में खर बुझेगा काठ के ऐसा बलेगा क्या।14।

न आँखों में बसा जो क्या भला मन में बसेगा वह।
न दरिया में हला जो वह समुन्दर में हलेगा क्या।15।

…………………………….. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ …………………………

[ कवि श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की कविता साभार उद्धृत ]

 

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भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ………

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           अप्रैल १७ , २०१६           अपराह्न १.००

 

 

……………………….. भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं  …………………..

देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं

रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं

काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं

भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं

हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले

सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।

आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।

जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए ।

व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कँपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।

………………………….. अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” ………………………….

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[ कवि श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” की कविता साभार उद्धृत ]

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एक तिनका है बहुत तेरे लिए …….

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           अप्रैल ३, २०१६           अपराह्न  २.२०

 

 

………………………… एक तिनका है बहुत तेरे लिए ……………………………

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।

एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।

आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।

एक तिनका आँख में मेरी पड़ा ।। 1 ।।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।

लाल होकर आँख भी दुखने लगी।

मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।

ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी ।। 2।।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।

तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये।

ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।

एक तिनका है बहुत तेरे लिए ।। 3 ।।

………………………….. अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” …………………………..

 

[ कवि श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” की कविता साभार उद्धृत ]

 

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