आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाएँ ……

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           फरवरी २१ , २०१६           रात्रि ११ . २०

 

इन्तेज़ामात नए सिरे से संभाले जाएँ ,
जितने कमजर्फ हैं महफ़िल से निकाले जाएँ ।

मेरा घर आग की लपटों में छुपा है लेकिन ,
जब मज़ा है तेरे आँगन में उजाले जाएँ ।

गम सलामत हैं तो पीते ही रहेंगे लेकिन ,
पहले मयखाने के हालात संभाले जाएँ ।

खाली वक्तों में कहीं बैठ के रो लें यारों ,
फुरसतें हैं तो समंदर ही खंगाले जाएँ ।

खाक में यों ना मिला ज़ब्त की तौहीन ना कर ,

ये वो आसूं हैं जो दुनिया को बहा ले जाएँ ।

हम भी प्यासे हैं ये अहसास तो हो साकी को ,
खाली शीशे ही हवाओं में उछाले जाएँ ।

आओ शहर में नए दोस्त बनाएं “राहत” ,
आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाएँ ।

…………………………………. राहत इन्दौरी …………………………………..

 

[ श्री राहत इन्दौरी की उर्दू  ग़ज़ल साभार उद्धृत ]

 

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चले चलो कि जहाँ तक ये आसमान रहे ……..

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           जनवरी , 31 , 2016            रात्रि 10.50

 

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सफ़र की हद है वहां तक कि कुछ निशान रहे ,
चले चलो कि जहाँ तक ये आसमान रहे |
ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल ,
मज़ा तो तब है कि पैरों में कुछ थकान रहे |
वो शख्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता हैं ,
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे |

मुझे ज़मीं की गहराइयों ने दबा लिया ,
मैं चाहता था कि मेरे सर पे आसमान रहे |

अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है ,
मगर ये बात हमारे ही दरमियाँ रहे |

सितारों की फसलें उगा ना सका कोई ,
मेरी ज़मीं पे कितने ही आसमान रहे |

वो एक सवाल है फिर उसका सामना होगा ,
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे ||

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रफ़्ता – रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए …..

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           जून 13 , 2013            सायम् 07.00

रफ़्ता – रफ़्ता  वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए ,

पहले जाँ, फिर जान – ए  – जाँ , फिर जान – ए – जाना हो गए ।

दिन – ब  – दिन  बढती गयी इस हुस्न की रानाइयाँ ,

पहले गुल,  फिर गुल बदन, फिर गुल – ब – दामाँ  हो गए ।

आप तो नज़दीक से नज़दीक तर आते गए ,

पहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमाँ हो गए ।

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ मिट गए ,

आप से फिर तुम हुए , फिर तू का उन्वाँ  हो गए ।

…………………… तसनीम फ़ाज़ली ……………………..

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एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग ……

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देवरिया  – उत्तर प्रदेश – भारत           अप्रैल 23 , 2013          रात्रि 07.30

……………………. ग़ज़ल ……………………..

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये गैरत का मुकाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग

 ………………………क़तील शिफाई ………………..

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… क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता

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मुंबई  – महाराष्ट्र  – भारत           अप्रैल 18 , 2013           अपराह्न 02.35

… क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता…

………………………वसीम बरेलवी………………………

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