आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाएँ ……

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           फरवरी २१ , २०१६           रात्रि ११ . २०

 

इन्तेज़ामात नए सिरे से संभाले जाएँ ,
जितने कमजर्फ हैं महफ़िल से निकाले जाएँ ।

मेरा घर आग की लपटों में छुपा है लेकिन ,
जब मज़ा है तेरे आँगन में उजाले जाएँ ।

गम सलामत हैं तो पीते ही रहेंगे लेकिन ,
पहले मयखाने के हालात संभाले जाएँ ।

खाली वक्तों में कहीं बैठ के रो लें यारों ,
फुरसतें हैं तो समंदर ही खंगाले जाएँ ।

खाक में यों ना मिला ज़ब्त की तौहीन ना कर ,

ये वो आसूं हैं जो दुनिया को बहा ले जाएँ ।

हम भी प्यासे हैं ये अहसास तो हो साकी को ,
खाली शीशे ही हवाओं में उछाले जाएँ ।

आओ शहर में नए दोस्त बनाएं “राहत” ,
आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाएँ ।

…………………………………. राहत इन्दौरी …………………………………..

 

[ श्री राहत इन्दौरी की उर्दू  ग़ज़ल साभार उद्धृत ]

 

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