चले चलो कि जहाँ तक ये आसमान रहे ……..

vidur

 

मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           जनवरी , 31 , 2016            रात्रि 10.50

 

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सफ़र की हद है वहां तक कि कुछ निशान रहे ,
चले चलो कि जहाँ तक ये आसमान रहे |
ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल ,
मज़ा तो तब है कि पैरों में कुछ थकान रहे |
वो शख्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता हैं ,
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे |

मुझे ज़मीं की गहराइयों ने दबा लिया ,
मैं चाहता था कि मेरे सर पे आसमान रहे |

अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है ,
मगर ये बात हमारे ही दरमियाँ रहे |

सितारों की फसलें उगा ना सका कोई ,
मेरी ज़मीं पे कितने ही आसमान रहे |

वो एक सवाल है फिर उसका सामना होगा ,
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे ||

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