सत्कार और तिरस्कार

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत ………. मई 19 , 2013           रात्रि  08.45

…………………….. सत्कार और तिरस्कार ……………………………
एक थका माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया । अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया । उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया , सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की , पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा , “उफ मुझे मत मारो।” दूसरी बार वह रोने लगा , “मत मारो मुझे , मत मारो… मत मारो ।
शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया , अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे हथौड़ी से तराशने लगा । वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसमे से एक एक देवी की मूर्ती उभर आई । मूर्ती वहीं पेड़ के नीचे रख वह अपनी राह पकड़ आगे चला गया ।
कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार को फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ा , जहाँ पिछली बार विश्राम किया था । उस स्थान पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ उस मूर्ती की पूजा अर्चना हो रही है , जो उसने बनाई थी । भीड़ है , भजन आरती हो रही है , भक्तों की पंक्तियाँ लगीं हैं , जब उसके दर्शन का समय आया , तो पास आकर देखा कि उसकी बनाई मूर्ती का कितना सत्कार हो रहा है ! जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने , उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक ओर में पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़ फोड़ कर मूर्ती पर चढ़ा रहे है ।
शिल्पकार ने मन ही मन सोचा कि जीवन में कुछ बन पाने के लिए शुरू में अपने शिल्पकार को पहचानकर , उनका सत्कार कर , कुछ कष्ट झेल लेने से जीवन बन जाता है । बाद में सारा विश्व उनका सत्कार करता है । जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं , उनका सत्कार कोई नहीं करता ।

[ सुश्री स्तुति सिंह की लघु कथा –  साभार उद्धृत ]

विदुर

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