ऊँचाई

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई 30 , 2013            रात्रि 11.30

…………………. ऊँचाई …………………….

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।
ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।
न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

……………………. अटल बिहारी वाजपेयी ……………………

श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता – साभार उद्धृत

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मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई 26 , 2013            रात्रि 11.55

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

…………………… धर्मवीर भारती ……………………

श्री धर्मवीर भारती की पुस्तक से साभार उद्धृत

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सत्कार और तिरस्कार

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत ………. मई 19 , 2013           रात्रि  08.45

…………………….. सत्कार और तिरस्कार ……………………………
एक थका माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया । अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया । उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया , सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की , पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा , “उफ मुझे मत मारो।” दूसरी बार वह रोने लगा , “मत मारो मुझे , मत मारो… मत मारो ।
शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया , अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे हथौड़ी से तराशने लगा । वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसमे से एक एक देवी की मूर्ती उभर आई । मूर्ती वहीं पेड़ के नीचे रख वह अपनी राह पकड़ आगे चला गया ।
कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार को फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ा , जहाँ पिछली बार विश्राम किया था । उस स्थान पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ उस मूर्ती की पूजा अर्चना हो रही है , जो उसने बनाई थी । भीड़ है , भजन आरती हो रही है , भक्तों की पंक्तियाँ लगीं हैं , जब उसके दर्शन का समय आया , तो पास आकर देखा कि उसकी बनाई मूर्ती का कितना सत्कार हो रहा है ! जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने , उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक ओर में पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़ फोड़ कर मूर्ती पर चढ़ा रहे है ।
शिल्पकार ने मन ही मन सोचा कि जीवन में कुछ बन पाने के लिए शुरू में अपने शिल्पकार को पहचानकर , उनका सत्कार कर , कुछ कष्ट झेल लेने से जीवन बन जाता है । बाद में सारा विश्व उनका सत्कार करता है । जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं , उनका सत्कार कोई नहीं करता ।

[ सुश्री स्तुति सिंह की लघु कथा –  साभार उद्धृत ]

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मैं नफ़रत तो नहीं लौटा सकता …….

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई  15 , 2013            रात्रि 10 . 45           

………………………….मैं नफ़रत तो नहीं लौटा सकता……………………….
शुक्रगुजार हूँ तुम्हारी नफ़रत के लिए
कल ही लिखा था अंतिम अंतिम विदा गीत
यादों के झरोंखों में धुंधली पड गयी
आज ही तुम्हारी तस्वीर
गायब हो जायेगी कल-परसों तक
नहीं करेगी नीद खराब अब बर्षों तक
शुक्रगुजार हूँ तुम्हारी नफ़रत के लिए
बने रहते यदि वैसे ही तटस्थ
न होता चरितार्थ
अंतिम, अंतिम विदागीत के
शीर्षक का संकल्प
मैं नफ़रत तो नहीं लौटा सकता
लेकिन सहता रहूँगा
तुम्हारे विरुद्ध एक-एक नाइंसाफी के
अपराधबोध का भार
तुम्हारा प्यार उल्लासित था
नफरत एक चुनौती
…………………………. Ish Mishra …………………

चालीसवाँ राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई 10 , 2013           रात्रि  00.15

…………………… चालीसवाँ राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव …………………….

पिछले दिनों
चालीसवाँ राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव मनाया गया।
सभी सरकारी संस्थानों को बुलाया गया।
भेजी गई सभी को निमंत्रण-पत्रावली
साथ मे प्रतियोगिता की नियमावली।
लिखा था-
प्रिय भ्रष्टोदय,
आप तो जानते हैं
भ्रष्टाचार हमारे देश की
पावन-पवित्र सांस्कृतिक विरासत है
हमारी जीवन-पद्धति है
हमारी मजबूरी है, हमारी आदत है।
आप अपने विभागीय भ्रष्टाचार का
सर्वोत्कृष्ट नमूना दिखाइए
और उपाधियाँ तथा पदक-पुरस्कार पाइए।
व्यक्तिगत उपाधियाँ हैं-
भ्रष्टशिरोमणि, भ्रष्टविभूषण
भ्रष्टभूषण और भ्रष्टरत्न
और यदि सफल हुए आपके विभागीय प्रयत्न
तो कोई भी पदक, जैसे-
स्वर्ण गिद्ध, रजत बगुला
या कांस्य कउआ दिया जाएगा।
सांत्वना पुरस्कार में
प्रमाण-पत्र और
भ्रष्टाचार प्रतीक पेय ह्वस्की का
एक-एक पउवा दिया जाएगा।
प्रविष्टियाँ भरिए
और न्यूनतम योग्यताएँ पूरी करते हों तो
प्रदर्शन अथवा प्रतियोगिता खंड में स्थान चुनिए।
कुछ तुले, कुछ अनतुले भ्रष्टाचारी
कुछ कुख्यात निलंबित अधिकारी
जूरी के सदस्य बनाए गए,
मोटी रकम देकर बुलाए गए।
मुर्ग तंदूरी, शराब अंगूरी
और विलास की सारी चीज़ें जरूरी
जुटाई गईं
और निर्णायक मंडल
यानी कि जूरी को दिलाई गईं।
एक हाथ से मुर्गे की टाँग चबाते हुए
और दूसरे से चाबी का छल्ला घुमाते हुए
जूरी का एक सदस्य बोला-
‘मिस्टर भोला !
यू नो
हम ऐसे करेंगे या वैसे करेंगे
बट बाइ द वे
भ्रष्टाचार नापने का पैमाना क्या है
हम फ़ैसला कैसे करेंगे ?

मिस्टर भोला ने सिर हिलाया
और हाथों को घूरते हुए फरमाया-
‘चाबी के छल्ले को टेंट में रखिए
और मुर्गे की टाँग को प्लेट में रखिए
फिर सुनिए मिस्टर मुरारका
भ्रष्टाचार होता है चार प्रकार का।
पहला-नज़राना !
यानी नज़र करना, लुभाना
यह काम होने से पहले दिया जाने वाला ऑफर है
और पूरी तरह से
देनेवाले की श्रद्धा और इच्छा पर निर्भर है।
दूसरा-शुकराना!
इसके बारे में क्या बताना !
यह काम होने के बाद बतौर शुक्रिया दिया जाता है
लेने वाले को
आकस्मिक प्राप्ति के कारण बड़ा मजा आता है।
तीसरा-हकराना, यानी हक जताना
-हक बनता है जनाब
बँधा-बँधाया हिसाब
आपसी सैटिलमेंट
कहीं दस परसेंट, कहीं पंद्रह परसेंट
कहीं बीस परसेंट ! पेमेंट से पहले पेमेंट।
चौथा जबराना।
यानी जबर्दस्ती पाना
यह देनेवाले की नहीं
लेनेवाले की
इच्छा, क्षमता और शक्ति पर डिपेंड करता है
मना करने वाला मरता है।
इसमें लेनेवाले के पास पूरा अधिकार है
दुत्कार है, फुंकार है, फटकार है।
दूसरी ओर न चीत्कार, न हाहाकार
केवल मौन स्वीकार होता है
देने वाला अकेले में रोता है।
तो यही भ्रष्टाचार का सर्वोत्कृष्ट प्रकार है
जो भ्रष्टाचारी इसे न कर पाए उसे धिक्कार है।
नजराना का एक पाइंट
शुकराना के दो, हकराना के तीन
और जबराना के चार
हम भ्रष्टाचार को अंक देंगे इस प्रकार।’

रात्रि का समय
जब बारह पर आ गई सुई
तो प्रतियोगिता शुरू हुई।
सर्वप्रथम जंगल विभाग आया
जंगल अधिकारी ने बताया-

‘इस प्रतियोगिता के
सारे फर्नीचर के लिए
चार हजार चार सौ बीस पेड़ कटवाए जा चुके हैं
और एक-एक डबल बैड, एक-एक सोफा-सैट
जूरी के हर सदस्य के घर, पहले ही भिजवाए जा चुके हैं
हमारी ओर से भ्रष्टाचार का यही नमूना है,
आप सुबह जब जंगल जाएँगे
तो स्वयं देखेंगे
जंगल का एक हिस्सा अब बिलकुल सूना है।’

अगला प्रतियोगी पी.डब्लू.डी. का
उसने बताया अपना तरीका-

‘हम लैंड-फिलिंग या अर्थ-फिलिंग करते हैं।
यानी ज़मीन के निचले हिस्सों को
ऊँचा करने के लिए मिट्टी भरते हैं।
हर बरसात में मिट्टी बह जाती है,
और समस्या वहीं-की-वहीं रह जाती है।
जिस टीले से हम मिट्टी लाते हैं
या कागजों पर लाया जाना दिखाते हैं
यदि सचमुच हमने उतनी मिट्टी को डलवाया होता
तो आपने उस टीले की जगह पृथ्वी में
अमरीका तक का आरपार गड्ढा पाया होता।
लेकिन टीला ज्यों-का-त्यों खड़ा है।
उतना ही ऊँचा, उतना ही बड़ा है
मिट्टी डली भी और नहीं भी
ऐसा नमूना नहीं देखा होगा कहीं भी।’

क्यू तोड़कर अचानक
अंदर घुस आए एक अध्यापक-

‘हुजूर
मुझे आने नहीं दे रहे थे
शिक्षा का भ्रष्टाचार बताने नहीं दे रहे थे
प्रभो !’

एक जूरी मेंबर बोला-‘चुप रहो

चार ट्यूशन क्या कर लिए
कि भ्रष्टाचारी समझने लगे
प्रतियोगिता में शरीक होने का दम भरने लगे !
तुम क्वालिफाई ही नहीं करते
बाहर जाओ-
नेक्स्ट, अगले को बुलाओ।’

अब आया पुलिस का एक दरोगा बोला-

‘हम न हों तो भ्रष्टाचार कहाँ होगा ?
जिसे चाहें पकड़ लेते हैं, जिसे चाहें रगड़ देते हैं
हथकड़ी नहीं डलवानी दो हज़ार ला,
जूते भी नहीं खाने दो हज़ार ला,
पकड़वाने के पैसे, छुड़वाने के पैसे
ऐसे भी पैसे, वैसे भी पैसे
बिना पैसे हम हिलें कैसे ?
जमानत, तफ़्तीश, इनवेस्टीगेशन
इनक्वायरी, तलाशी या ऐसी सिचुएशन
अपनी तो चाँदी है,
क्योंकि स्थितियाँ बाँदी हैं
डंके का ज़ोर हैं
हम  अपराध मिटाते नहीं हैं
अपराधों की फ़सलकी देखभाल करते हैं
वर्दी और डंडे से कमाल करते हैं।’

फिर आए क्रमश:
एक्साइज वाले, इनकम टैक्स वाले,
स्लमवाले, कस्टमवाले,
डी.डी.ए.वाले
टी.ए.डी.ए.वाले
रेलवाले, खेलवाले
हैल्थवाले, वैल्थवाले,
रक्षावाले, शिक्षावाले,
कृषिवाले, खाद्यवाले,
ट्रांसपोर्टवाले, एअरपोर्टवाले
सभी ने बताए अपने-अपने घोटाले।

प्रतियोगिता पूरी हुई
तो जूरी के एक सदस्य ने कहा-

‘देखो भाई,
स्वर्ण गिद्ध तो पुलिस विभाग को जा रहा है
रजत बगुले के लिए
पी.डब्लू.डी
डी.डी.ए.के बराबर आ रहा है
और ऐसा लगता है हमको
काँस्य कउआ मिलेगा एक्साइज या कस्टम को।’

निर्णय-प्रक्रिया चल ही रही थी कि
अचानक मेज फोड़कर
धुएँ के बादल अपने चारों ओर छोड़कर
श्वेत धवल खादी में लक-दक
टोपीधारी गरिमा-महिमा उत्पादक
एक विराट व्यक्तित्व प्रकट हुआ
चारों ओर रोशनी और धुआँ।
जैसे गीता में श्रीकृष्ण ने
अपना विराट स्वरूप दिखाया
और महत्त्व बताया था
कुछ-कुछ वैसा ही था नज़ारा

विराट नेताजी ने मेघ-मंद्र स्वर में उचारा-

‘मेरे हज़ारों मुँह, हजारों हाथ हैं
हज़ारों पेट हैं, हज़ारों ही लात हैं।
नैनं छिंदति पुलिसा-वुलिसा
नैनं दहति संसदा !
नाना विधानि रुपाणि
नाना हथकंडानि च।
ये सब भ्रष्टाचारी मेरे ही स्वरूप हैं
मैं एक हूँ, लेकिन करोड़ों रूप हैं।
अहमपि नजरानम् अहमपि शुकरानम्
अहमपि हकरानम् च जबरानम् सर्वमन्यते।
भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट
रिश्वतख़ोर थानेदार
इंजीनियर, ओवरसियर
रिश्तेदार-नातेदार
मुझसे ही पैदा हुए, मुझमें ही समाएँगे
पुरस्कार ये सारे मेरे हैं, मेरे ही पास आएँगे।’

………………………. अशोक चक्रधर ……………………………

 

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क्षमा शोभती उस भुजंग को , जिसके पास गरल हो …

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत            मई  08 , 2013           रात्रि  01.00

 

………… शक्ति और क्षमा …………….. 

================================

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है

हिन्दी: दिनकर की हस्ताक्षर English:

 

……………………. रामधारी सिंह “दिनकर” …………………………

Facebook के सौजन्य से

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जय जय महाराष्ट्र माझा, गर्जा महाराष्ट्र माझा

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मुंबई  –  महाराष्ट्र  –  भारत           मई 01, 2013           रात्रि  11.25

……….. जय जय महाराष्ट्र माझा, गर्जा महाराष्ट्र माझा ……………….

जय जय महाराष्ट्र माझा, गर्जा महाराष्ट्र माझा

रेवा वरदा, कृष्ण कोयना, भद्रा गोदावरी
एकपणाचे भरती पाणी मातीच्या घागरी
भीमथडीच्या तट्टांना या यमुनेचे पाणी पाजा
जय जय महाराष्ट्र माझा ...

भीती न आम्हा तुझी मुळी ही गडगडणार्‍या नभा
अस्मानाच्या सुलतानीला जवाब देती जीभा
सह्याद्रीचा सिंह गर्जतो, शिवशंभू राजा
दरीदरीतून नाद गुंजला महाराष्ट्र माझा

काळ्या छातीवरी कोरली अभिमानाची लेणी
पोलादी मनगटे खेळती खेळ जीवघेणी
दारिद्र्याच्या उन्हात शिजला, निढ़ळाच्या घामाने भिजला
देशगौरवासाठी झिजला
दिल्लीचेही तख्त राखितो, महाराष्ट्र माझा

गीतकार : राजा बढे, गायक : शाहीर साबळे, संगीतकार : श्रीनिवास खळे

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